Tuesday, 7 June 2016

ऐस हूँ मैं.हाँ, बिल्कुल ऐसा, जैसा मैं दिख रहा हूँ,हंस रहा हूँ, बोल रहा हूँ, लिख रहा हूँ.समझदार हूँ कुछ ज़्यादा, दोस्त हूँ सबका,अच्छे लोगों से घिरा हुआ, वादे का पक्का;कभी कभी कुछ अधिक बोल जाता हूँ,लोग कहते हैं, मैं इंसान हूँ अच्छाअपनाया है सबने, जैसा भी हूँ मैं.ऐसा ही हूँ मैं.देर करने की आदत बचपन से है,दोस्तों को इसकी शिकायत उन्नीस सौ छप्पन से है,दो हज़ार तेरह में भी नही बदला मैं,जबकि बदलने की चाहत लड़कपन से है.बदल ना पाया  खुद को कैसा भी हूँ मैं,ऐसा ही हूँ मैं.माँ पिताजी का आदर्श बेटा, भाभियों का दुलारा देवर,भाई बहनों का प्यारा भैया, सबने चढ़ा रखा है सर पर;दोस्तों का कमीना दोस्त, पार्टी का बिंदास डाँसर,घंटों फोन पे चिपके रहना, हर वीकेंड किसी और के घर.वो घुमंतू होते हैं ना? उन जैसा ही हूँ मैं,ऐसा ही हूँ मैं.अब चाहता हूँ मैं थोड़ा बदल जाउ,बहुत भटक चुका अब संभल जाउ;जीवन का सुनहरा अध्याय शायद पूरा हो चुका,अगले अध्याय में हीरे सा जड़ जाउ.बदलने को तत्पर फिर वैसा ही हूँ मैं,ऐसा ही हूँ मैं,हां, ऐसा ही हूँ मैं...

बड़े दिनों के बाद



बड़े दिनों के बाद आजसूरज से पहले जगी,
 बड़े दिनों के बाद सुबह की ठंढी हवा मुझ पर लगी।
बड़े दिनों के बाद पाया मन पर कोई बोझ नहीं,
बड़े दिनों के बाद उठकरसुबह नयी-नयी सी  लगी।
बड़े दिनों के बाद दिन के शुरुआत की उमंग जगी,
बड़े दिनों के बाद मन में पंख से हैं लगे कहीं।
बड़े दिनों के बाद आजमन में एक कविता उठी,
बबड़े दिनों के बाद आज,कविता काग़ज़ पर लिखी।   


   .......मोहिनी

बड़े दिनों के बाद

बड़े दिनों के बाद आजसूरज से पहले जगी,
बड़े दिनों के बाद सुबह की ठंढी हवा मुझपर लगी।
बड़े दिनों के बाद पाया मन पर कोई बोझ नहीं,
बड़े दिनों के बाद उठकरसुबह नयी-नयी सी  लगी
बड़े दिनों के बाद दिन केशुरुआत की उमंग जगी,
बड़े दिनों के बाद मन में पंख से हैं लगे कहीं।
बड़े दिनों के बाद आजमन में एक कविता उठी,
बड़े दिनों के बाद आज,कविता काग़ज़ पर लिखी।